शोधकर्ताओं की एक टीम ने डिप्रेशन से निपटने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रक्त के एक घटक प्लेटलेट्स में अवसाद के बायोमार्कर की पहचान की है जिससे विकार की गंभीरता का पता लगाना आसान होगा। यह शोध मालीक्यूलर साइकाइअट्री जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
शिकागो, एएनआइ: इंसान में अवसाद की जांच की जटिलता आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई। इसलिए समय पर इसकी पहचान नहीं हो पाती है और फिर इलाज में भी देरी होती है, जिससे स्थिति बिगड़ जाती है। लेकिन शोधकर्ताओं की एक टीम ने इस समस्या के समाधान की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रक्त के एक घटक प्लेटलेट्स में अवसाद के बायोमार्कर की पहचान की है, जिससे विकार की गंभीरता का पता लगाना आसान होगा। यह शोध मालीक्यूलर साइकाइअट्री जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
यूनिवर्सिटी आफ इलिनोइस शिकागो का शोध
यूनिवर्सिटी आफ इलिनोइस शिकागो में फिजियोलाजी एंड बायोफिजिक्स एंड साइकाइअट्री के प्रोफेसर मार्क रसेनिक के नेतृत्व वाली शोधकर्ताओं की टीम ने यह उपलब्धि हासिल की है। पूर्व के कई अध्ययनों में यह बताया गया है कि इंसान और जानवरों के माडलों में एडेनिल साइक्लेज की कमी से अवसाद की स्थिति पैदा होना पाया गया है। एडेनिल साइक्लेज कोशिका के अंदर एक छोटा सा मालीक्यूल (अणु) होता है, जो न्यूरोट्रांसमीटर -सेरोटोनिन और एपिनेफ्रीन की प्रतिक्रिया में बनता है। रसेनिक ने बताया कि जब आप अवसादग्रस्त होते हैं तो एडेनिल साइक्लेज का स्तर कम होता है। इसका कारण यह होता है कि एडेनिल साइक्लेज के कम होने से ऐसा इंटरमिडिएटरी प्रोटीन क्षीण हो जाता है, जो न्यूरोट्रांसमीटर को एडेनिल साइक्लेज- जीएस अल्फा बनाने में की मदद करता है और यह कोलेस्ट्राल युक्त मैट्रिक्स वाली झिल्ली (लिपिड राफ्ट) से चिपक जाता है, जहां वह अपना काम ठीक तरह से नहीं कर पाता है।
नए बायोमार्कर की पहचान
नए अध्ययन में ऐसे कोशिकीय बायोमार्कर की पहचान की गई है, जो जीएस अल्फा को लिपिड राफ्ट से स्थानांतरित कर देता है। इस बायोमार्कर की पहचान ब्लड टेस्ट से की जा सकती है। उन्होंने बताया कि हमने एक ऐसी जांच विकसित की है, जो न सिर्फ अवसाद होना बताएगी बल्कि इससे एक ही बायोमार्कर से इलाज के असर का भी संकेत मिलेगा। शोधकर्ताओं का मानना है कि वे इस ब्लड टेस्ट के जरिये महज एक सप्ताह में यह भी पता कर सकेंगे कि अवसादरोधी जो इलाज किया जा रहा है, उसका असर हो रहा है या नहीं। पूर्व के शोध में यह बताया जा चुका है कि अवसाद के लक्षण जब कम होते हैं तो जीएस अल्फा लिपिड राफ्ट से अलग हो जाता है। हालांकि अवसादरोधी दवा लेने के बावजूद जिन मरीजों में सुधार नहीं होता है, उनमें जीएस अल्फा राफ्ट से चिपके ही रहते हैं। इसका मतलब यह है कि रक्त प्रवाह में अवसादरोधी की पर्याप्तता नहीं है, जिससे कि लक्षणों में सुधार हो सके। इलाज शुरू करने के एक बाद ही ब्लड टेस्ट से यह पता चल जाएगा कि जीएस अल्फा लिपिड राफ्ट से अलग हुआ है या नहीं।


















