Home Uncategorized सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को लगाई कड़ी फटकार, जानिये क्या है...

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को लगाई कड़ी फटकार, जानिये क्या है खास मामला

0
227

दिल्‍ली , सुप्रीम कोर्ट ने उत्‍तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर नहीं माने तो अंजाम भुगतने को तैयार रहें। हम आपको बताएंगे कि कैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का पालन किया जाना चाहिए।

ADVT

सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2019 में संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ कथित तौर पर आंदोलन कर रहे लोगों को वसूली के नोटिस भेजे जाने पर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई। कोर्ट ने यह कार्यवाही वापस लेने के लिए उसे अंतिम मौका दिया और कहा कि ऐसा नहीं होने पर न्यायालय कानून का उल्लंघन करने वाली इस कार्यवाही को निरस्त कर देगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिसंबर 2019 में शुरू की गई यह कार्यवाही कानून के खिलाफ है और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती है।

न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने आरोपियों की संपत्तियों को जब्त करने की कार्यवाही के लिए खुद ही शिकायतकर्ता, न्यायकर्ता और अभियोजक की तरह काम किया है। पीठ ने कहा कि कार्यवाही वापस लें या हम इस अदालत की ओर से निर्धारित कानून का उल्लंघन करने के लिए इसे रद्द कर देंगे।

सुप्रीम कोर्ट परवेज आरिफ टीटू की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इसमें उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन के दौरान सार्वजनिक संपत्तियों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए जिला प्रशासन की ओर से कथित प्रदर्शनकारियों को भेजे गए नोटिस रद्द करने की अपील की गई है और उसने इस पर राज्य से इसका जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस तरह के नोटिस मनमाने तरीके से भेजे गए हैं। यह एक ऐसे व्यक्ति को भेजा गया है जिसकी मृत्यु छह साल पहले 94 वर्ष की आयु में हुई थी। साथ ही ऐसे नोटिस 90 वर्ष से अधिक आयु के दो लोगों सहित कई अन्य लोगों को भी भेजे गए थे।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता गरिमा प्रसाद ने कहा कि राज्य में 833 दंगाइयों के खिलाफ 106 प्राथमिकी दर्ज की गईं और उनके खिलाफ 274 वसूली नोटिस जारी किए गए। उन्होंने कहा, “274 नोटिस में से, 236 में वसूली के आदेश पारित किए गए थे, जबकि 38 मामले बंद कर दिए गए थे। 2020 में अधिसूचित नए कानून के तहत, दावा न्यायाधिकरण का गठन किया गया है, जिसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश कर रहे हैं और पहले इसकी अध्यक्षता अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) करते थे।”

पीठ ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 2009 और 2018 में दो फैसलों में कहा है कि न्यायिक अधिकारियों को दावा न्यायाधिकरणों में नियुक्त किया जाना चाहिए लेकिन इसके बजाय आपने एडीएम नियुक्त किए हैं। प्रसाद ने कहा कि सीएए के विरोध के दौरान 451 पुलिसकर्मी घायल हुए और समानांतर आपराधिक कार्रवाई और वसूली की कार्रवाई की गई। पीठ ने कहा कि आपको कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। कृपया इसकी जांच करें, हम 18 फरवरी तक एक मौका दे रहे हैं। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘मैडम प्रसाद, यह सिर्फ एक सुझाव है। यह याचिका केवल एक तरह के आंदोलन या विरोध के संबंध में दिसंबर 2019 में भेजे गए नोटिसों से संबंधित है। आप उन्हें एक झटके में वापस ले सकते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में 236 नोटिस कोई बड़ी बात नहीं है। अगर नहीं माने तो अंजाम भुगतने को तैयार रहें। हम आपको बताएंगे कि कैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का पालन किया जाना चाहिए।’’

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि ‘हमें अन्य कार्यवाही से कोई सरोकार नहीं है। हम केवल उन नोटिसों से चिंतित हैं जो दिसंबर 2019 में सीएए के विरोध के दौरान भेजे गए हैं। आप हमारे आदेशों को दरकिनार नहीं कर सकते।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here